उस रात ज़ोरों की बारिश थी, बिजली इस तरह रह रहकर चमक रही थी, जैसे मानो अपनी आगोश में पूरी दुनिया को समेट लेना चाहती हो। ऐसी भयानक बरसात की वो रात और ऐसे में उस बला की खूबसूरत, हसीन औरत का सुनसान रास्ते पर तेज कदमों से अकेले बेखौफ दौड़ना जैसे कि वो इस रास्ते से पूरी तरह वाकिफ हो।
अचानक दरवाजे पर जोर जोर से हाथों को बेतहाशा पीटते जाना और जब तक मैंने दरवाजा खोल नहीं दिया, उसके हाथ रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
दरवाजा खोलते ही, वो बेदम सी भीतर घुसते ही फर्श पर गिर गयी।
चेहरे पर भीगी जुल्फें कुछ इस तरह बिखरी थीं, जैसे कि स्याह रात की चादर ओढ़े चांद छिपा हो।
मैं धीरे से उसके करीब पहुंचा और जैसे ही उसे बाहों में उठाने की कोशिश की, वो जैसे नींद से जाग गयी, और रोते हुए बोली, 'मुझे मत मारो, मुझे मत मारो'।
मैंने कहा, 'डरो मत, कोई तुम्हें नहीं मार रहा, यहां कोई ऐसा नहीं है जो तुम्हें मारेगा', कौन हो तुम, मैंने उसकी ओर एक साथ कई सवाल लिये हुए आंखों से देखते हुए पूछा, जैसे कि मैं एक ही सवाल में उससे जुड़े कई जवाब पाना चाहता था।
उसने अब तक खुद को सम्भाल लिया था, अपने भीगे बदन को अपनी फटी हुई चुन्नी से ढकने की कोशिश करते हुए बोली, 'जी,,,जी,,, मेरा नाम, रानी है, पर शायद ही मुझसे गरीब कोई और हो इस दुनिया में,' इतना कहते हुए वो अचानक चुप हो गयी और फिर हाथों से मुंह को छिपाते हुए रोने लगी,, वो बेसख्ता रोए जा रही थी, मैंने उसे चुप कराने की कोशिश की, मगर उसके आंसू जैसे इस बारिश पर भी भारी पड़ रहे थे। वो रोए जा रही थी।
मैं भी पास रखी आराम कुर्सी पर जाकर बैठ गया और उसके चुप होने का इन्तजार करने लगा।
बाहर सांय-सांय की आवाज के साथ, तेज हवाएं और चमकती बिजली के साथ मूसलाधार बारिश जैसे इस रात को और भी खौफनाक बना रही थी।
मैं कुर्सी से उठकर किचन की ओर गया और जब बाहर आया तो मेरे हाथ में दो कप कॉफी के थे।
एक कप मैंने उस अजनबी पर अब तक शायद मेरे लिए कुछ परिचित सी हो गयी थी, की ओर बढ़ाया और बोला, गर्म कॉफी पियो, ठंड नहीं लगेगी।
उसने झट से प्याला मेरे हाथ से ले लिया और जल्दी जल्दी घूंट लेने लगी, जैसे कि वो इसे एक बार में ही खत्म कर देना चाहती हो।
मैं भी अपनी आराम कुर्सी पर बैठ कर एक एक सिप लेने लगा। और न चाहते हुए भी मेरी नजरें, उसकी ओर चली जाती थीं, मगर वो इस बात से बेखबर, सिर्फ कॉफी पीने पर अपना ध्यान केंद्रित किए थी।
खैर, इस दौरान कमरे में बिल्कुल सन्नाटा पसरा था, मैं भी अपनी कॉफी पीने में मस्त था, अचानक उसने कहा, 'बाबूजी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! आज अगर आप न होते तो शायद, मैं दूसरी बार मर गयी होती'।
उसकी बात, सुनकर, मेरी प्रश्नवाचक निगाहें एक बार फिर उसे देखने लगीं।
इस बार जैसे वो समझ गयी थी कि मैं उससे क्या पूछना चाहता हूं।
उसने बताना शुरू किया,,
'बाबू जी! करीब चार साल पहले की बात है, मेरे पिता ने अपने कर्ज को चुकाने के लिये मेरा सौदा गांव के जमींदार से कर दिया था। पिता ने कहा कि वह उस जमींदार से मेरी शादी करा रहे हैं।
मगर, यह कैसी शादी थी, जिसमें न तो बैंड बजा, न बरात आई, न कोई धूमधड़ाका, न फेरे, न मैं दुल्हन बनी, बस मैं जिस हाल में थी, मुझे वैसे ही, उस जमींदार के साथ उसकी गाड़ी में बैठाकर विदा कर दिया गया।
पीछे से मेरी मां जरूर रोती बिलखती, दरवाजे तक आई, मगर पिता जी ने उसे धक्के देकर घर के भीतर भेज दिया। वह शायद अन्तिम दिन था मां को देखे, उस दिन से आज तक मां के लिये तड़प रही हूं।
पिता के घर से विदा होकर, जब जमींदार के घर पहुंची तो वहां भी शादी जैसी कोई रौनक नहीं थी, हां कुछ दो-चार खतरनाक किस्म के हैवान जरूर दिखे, जो आंगन में शराब की बोतलों के साथ बैठे एक दूसरे से जाम टकरा रहे थे,,,
मुझे लेकर जब जमींदार आंगन में पहुंचा तो वे एक साथ बोले, 'आखिरकार आज चिड़िया आपके जाल में फंस ही गयी। उनकी बातें सुनकर, मैं घबरा गई, मेरी जान जैसे अब निकली तब निकली वाली स्थिति में थी।
वो बोला, इसी दिन का तो कब से इंतजार था, आज इस दिल की प्यास बुझेगी।
इतना कहकर, वो मुझे खींचते हुए ऊपर के कमरे में ले गया, जहां सुहाग की सेज तो सजी थी, पर दुल्हन कहीं नजर नहीं आ रही थी।
फिर उसने मुझे उस सेज पर बैठाया और कमरे को बंद कर दिया।
मैंने उससे विनती की कि मुझे छोड़ दे, मुझे जाने दे, आखिर यह कैसा ब्याह है,,
मैंने तो अब तक अपनी कई सहेलियों को दुल्हन बनते देखा था, और उनकी शादी के बाद मैं भी सपने सँजोने लगी थी, एक सुन्दर, सजीले दूल्हे के, वो आएगा और अपने साथ सुन्दर सी दुनिया में ले जायेगा। फिर अपने हाथों से मेरा घूंघट उठायेगा और मैं शर्माते हुए अपने हाथों से चेहरा छिपा लूंगी।
मेरी तंद्रा अचानक उस वक्त भंग हुई, जब जमींदार ने पीछे से मेरे कन्धे पर हाथ रखा और मुझे बिस्तर पर गिरा दिया।
उस वक्त मेरी आंखों में बसे वो सजीले सुन्दर दूल्हे के सपने, जैसे एक-एक करके चूर-चूर होने लगे।
उस सुहाग की सेज पर मैं ऐसे पड़ी थी, जैसे कि कोई बेजान गुड़िया, जिसे किसी राक्षस के हाथों में सौंप दिया गया हो और वो उस गुड़िया के एक-एक अंग को छिन्न-भिन्न कर रहा हो।
मेरी पथरायी आंखें छत को निहार रहीं थीं, आत्मा तो जैसे जिस्म से कबकी निकल चुकी थी, मगर शायद इस जिस्म को अभी और कुचला जाना बाकी था,,,
उसे जब लगा कि उसकी भूख शान्त हो गयी है, तो वो दरवाजा खोलकर बाहर चला गया, और एक के बाद एक बाहर बैठे वो चारों राक्षस भीतर आते गये और अपनी-अपनी भूख मिटाते रहे।
मैं बेदम सी पड़ी सिर्फ यही सोचती रही कि कुछ रुपयों की कीमत क्या इस तरह चुकानी पड़ती है,,, यह सिलसिला पिछ्ले चार सालों से चल रहा था,, पर आज मौका पाकर मैं वहां से भाग निकली,,, मगर अब और भागने की ताकत रही।
अब बहुत थक गई हूँ,,, इस जिंदगी से भी,, और इसकी ख्वाहिशों से भी।
बस अब और नहीं,,,
शायद वो सजीला, सुन्दर, दूल्हा मेरी किस्मत में ही नहीं था, जिसे मैंने अपने सपनों में संजोया था। गरीबों को कभी कोई ख्वाहिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि वो कभी पूरी नहीं होती।
इतना कहते हुए, वो फिर बिलखने लगी।
उसकी सिसकियों ने जैसे मुझे मेरे विचारों से बाहर खींचा।
मैं उठकर उसके पास गया और उसके सिर पर हाथ रखकर सहलाया और बोला, 'ख्वाहिशें कभी अधूरी नहीं होती, बस जब तक उनके पूरे होने का वक्त नहीं आता तब तक वो पूरी नहीं होतीं।
तुम चाहो तो आज भी तुम्हारी वो अधूरी ख्वाहिश पूरी हो सकती है,,,
इस बार उसने मुझे सवालिया नजरों से देखा, जैसे उसको यह लग रहा हो कि कहीं मैं भी उसकी मजबूरी का फायदा तो नहीं उठाना चाहता, या फिर शायद कुछ और सवाल जो उसके मन-मस्तिष्क में आ रहे हों।
मैं उठकर भीतर गया, अलमारी से सुर्ख लाल जोड़ा और सोने के गहने निकाले, और ले जाकर उसके हाथों में रख दिए।
फिर मैं, अपनी कुर्सी पर बैठ गया, अब मैंने बोलना शुरू किया, ऐसी ही एक भयानक रात थी, जब मैं रूपा के साथ शिमला से अपना हनीमून मनाकर लौट रहा था,, हमारी शादी को अभी केवल 15 दिन बीते थे,, लौटकर मुझे अपनी ड्यूटी ज्वाईन करनी थी,, कार में हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे कुछ ऐसे बैठे थे जैसे कि अब कभी ये हाथ जुदा नहीं होंगे,, अचानक,, जोर के झटका लगा और हमारी कार, खाई में जा गिरी।
जब होश आया तो पता चला कि तीन दिन पहले भयानक एक्सीडेंट में मैंने रूपा को खो दिया था।
किसी तरह उस हादसे से खुद को उबारा आज इस बात को बीते आठ साल हो चुके हैं। मगर आज भी लगता है जैसे वो मेरे आसपास है।
इतना कहकर, राजीव अपनी कुर्सी से उठा और अब तक खाली हो चुके कॉफी के दोनों कप उठाकर किचन की ओर बढ़ गया।
इधर, रानी भी अपनी जगह से उठकर वॉशरूम की ओर चल दी।
थोड़ी देर बाद, जब वो बाहर आई, तो राजीव की नजरें उस पर से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं,,, उसे लग रहा था मानो, रूपा यहीं तो थी,, उसके पास,,, हमेशा,,, वो कहीं नहीं गयी थी,,, अचानक वो आगे बढ़ा और उसने उस लाल सुर्ख जोड़े में लिपटी, गहनों से सजी रानी को अपनी बांहों में भर लिया,,, बेतहाशा उसे चूमने लगा,,, उसकी आंखों से आंसू इस तरह बहने लगे जैसे मानो कबसे उसने उन पर रोक लगा रखी थी,,, इधर रानी भी बेसाख्ता रोए जा रही थी,,,
बाहर और भीतर दोनों ओर बारिश का जैसे सैलाब आ गया हो।
बाहर की बारिश धरती के गर्भ को सींच रही थी, और भीतर की बारिश जैसे अधूरी ख़्वाहिशों को,,,
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ख्वाहिशें हमेशा पूरी होती हैं, बस उम्मीद का दामन कभी मत छोड़िए।
Be positive, live positive
उम्मीद है, आपको कहानी पसंद आई होगी।
जल्दी ही फिर हाजिर होऊंगी, एक नई कहानी के साथ।
Till then bye 🙏
अचानक दरवाजे पर जोर जोर से हाथों को बेतहाशा पीटते जाना और जब तक मैंने दरवाजा खोल नहीं दिया, उसके हाथ रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
दरवाजा खोलते ही, वो बेदम सी भीतर घुसते ही फर्श पर गिर गयी।
चेहरे पर भीगी जुल्फें कुछ इस तरह बिखरी थीं, जैसे कि स्याह रात की चादर ओढ़े चांद छिपा हो।
मैं धीरे से उसके करीब पहुंचा और जैसे ही उसे बाहों में उठाने की कोशिश की, वो जैसे नींद से जाग गयी, और रोते हुए बोली, 'मुझे मत मारो, मुझे मत मारो'।
मैंने कहा, 'डरो मत, कोई तुम्हें नहीं मार रहा, यहां कोई ऐसा नहीं है जो तुम्हें मारेगा', कौन हो तुम, मैंने उसकी ओर एक साथ कई सवाल लिये हुए आंखों से देखते हुए पूछा, जैसे कि मैं एक ही सवाल में उससे जुड़े कई जवाब पाना चाहता था।
उसने अब तक खुद को सम्भाल लिया था, अपने भीगे बदन को अपनी फटी हुई चुन्नी से ढकने की कोशिश करते हुए बोली, 'जी,,,जी,,, मेरा नाम, रानी है, पर शायद ही मुझसे गरीब कोई और हो इस दुनिया में,' इतना कहते हुए वो अचानक चुप हो गयी और फिर हाथों से मुंह को छिपाते हुए रोने लगी,, वो बेसख्ता रोए जा रही थी, मैंने उसे चुप कराने की कोशिश की, मगर उसके आंसू जैसे इस बारिश पर भी भारी पड़ रहे थे। वो रोए जा रही थी।
मैं भी पास रखी आराम कुर्सी पर जाकर बैठ गया और उसके चुप होने का इन्तजार करने लगा।
बाहर सांय-सांय की आवाज के साथ, तेज हवाएं और चमकती बिजली के साथ मूसलाधार बारिश जैसे इस रात को और भी खौफनाक बना रही थी।
मैं कुर्सी से उठकर किचन की ओर गया और जब बाहर आया तो मेरे हाथ में दो कप कॉफी के थे।
एक कप मैंने उस अजनबी पर अब तक शायद मेरे लिए कुछ परिचित सी हो गयी थी, की ओर बढ़ाया और बोला, गर्म कॉफी पियो, ठंड नहीं लगेगी।
उसने झट से प्याला मेरे हाथ से ले लिया और जल्दी जल्दी घूंट लेने लगी, जैसे कि वो इसे एक बार में ही खत्म कर देना चाहती हो।
मैं भी अपनी आराम कुर्सी पर बैठ कर एक एक सिप लेने लगा। और न चाहते हुए भी मेरी नजरें, उसकी ओर चली जाती थीं, मगर वो इस बात से बेखबर, सिर्फ कॉफी पीने पर अपना ध्यान केंद्रित किए थी।
खैर, इस दौरान कमरे में बिल्कुल सन्नाटा पसरा था, मैं भी अपनी कॉफी पीने में मस्त था, अचानक उसने कहा, 'बाबूजी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! आज अगर आप न होते तो शायद, मैं दूसरी बार मर गयी होती'।
उसकी बात, सुनकर, मेरी प्रश्नवाचक निगाहें एक बार फिर उसे देखने लगीं।
इस बार जैसे वो समझ गयी थी कि मैं उससे क्या पूछना चाहता हूं।
उसने बताना शुरू किया,,
'बाबू जी! करीब चार साल पहले की बात है, मेरे पिता ने अपने कर्ज को चुकाने के लिये मेरा सौदा गांव के जमींदार से कर दिया था। पिता ने कहा कि वह उस जमींदार से मेरी शादी करा रहे हैं।
मगर, यह कैसी शादी थी, जिसमें न तो बैंड बजा, न बरात आई, न कोई धूमधड़ाका, न फेरे, न मैं दुल्हन बनी, बस मैं जिस हाल में थी, मुझे वैसे ही, उस जमींदार के साथ उसकी गाड़ी में बैठाकर विदा कर दिया गया।
पीछे से मेरी मां जरूर रोती बिलखती, दरवाजे तक आई, मगर पिता जी ने उसे धक्के देकर घर के भीतर भेज दिया। वह शायद अन्तिम दिन था मां को देखे, उस दिन से आज तक मां के लिये तड़प रही हूं।
पिता के घर से विदा होकर, जब जमींदार के घर पहुंची तो वहां भी शादी जैसी कोई रौनक नहीं थी, हां कुछ दो-चार खतरनाक किस्म के हैवान जरूर दिखे, जो आंगन में शराब की बोतलों के साथ बैठे एक दूसरे से जाम टकरा रहे थे,,,
मुझे लेकर जब जमींदार आंगन में पहुंचा तो वे एक साथ बोले, 'आखिरकार आज चिड़िया आपके जाल में फंस ही गयी। उनकी बातें सुनकर, मैं घबरा गई, मेरी जान जैसे अब निकली तब निकली वाली स्थिति में थी।
वो बोला, इसी दिन का तो कब से इंतजार था, आज इस दिल की प्यास बुझेगी।
इतना कहकर, वो मुझे खींचते हुए ऊपर के कमरे में ले गया, जहां सुहाग की सेज तो सजी थी, पर दुल्हन कहीं नजर नहीं आ रही थी।
फिर उसने मुझे उस सेज पर बैठाया और कमरे को बंद कर दिया।
मैंने उससे विनती की कि मुझे छोड़ दे, मुझे जाने दे, आखिर यह कैसा ब्याह है,,
मैंने तो अब तक अपनी कई सहेलियों को दुल्हन बनते देखा था, और उनकी शादी के बाद मैं भी सपने सँजोने लगी थी, एक सुन्दर, सजीले दूल्हे के, वो आएगा और अपने साथ सुन्दर सी दुनिया में ले जायेगा। फिर अपने हाथों से मेरा घूंघट उठायेगा और मैं शर्माते हुए अपने हाथों से चेहरा छिपा लूंगी।
मेरी तंद्रा अचानक उस वक्त भंग हुई, जब जमींदार ने पीछे से मेरे कन्धे पर हाथ रखा और मुझे बिस्तर पर गिरा दिया।
उस वक्त मेरी आंखों में बसे वो सजीले सुन्दर दूल्हे के सपने, जैसे एक-एक करके चूर-चूर होने लगे।
उस सुहाग की सेज पर मैं ऐसे पड़ी थी, जैसे कि कोई बेजान गुड़िया, जिसे किसी राक्षस के हाथों में सौंप दिया गया हो और वो उस गुड़िया के एक-एक अंग को छिन्न-भिन्न कर रहा हो।
मेरी पथरायी आंखें छत को निहार रहीं थीं, आत्मा तो जैसे जिस्म से कबकी निकल चुकी थी, मगर शायद इस जिस्म को अभी और कुचला जाना बाकी था,,,
उसे जब लगा कि उसकी भूख शान्त हो गयी है, तो वो दरवाजा खोलकर बाहर चला गया, और एक के बाद एक बाहर बैठे वो चारों राक्षस भीतर आते गये और अपनी-अपनी भूख मिटाते रहे।
मैं बेदम सी पड़ी सिर्फ यही सोचती रही कि कुछ रुपयों की कीमत क्या इस तरह चुकानी पड़ती है,,, यह सिलसिला पिछ्ले चार सालों से चल रहा था,, पर आज मौका पाकर मैं वहां से भाग निकली,,, मगर अब और भागने की ताकत रही।
अब बहुत थक गई हूँ,,, इस जिंदगी से भी,, और इसकी ख्वाहिशों से भी।
बस अब और नहीं,,,
शायद वो सजीला, सुन्दर, दूल्हा मेरी किस्मत में ही नहीं था, जिसे मैंने अपने सपनों में संजोया था। गरीबों को कभी कोई ख्वाहिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि वो कभी पूरी नहीं होती।
इतना कहते हुए, वो फिर बिलखने लगी।
उसकी सिसकियों ने जैसे मुझे मेरे विचारों से बाहर खींचा।
मैं उठकर उसके पास गया और उसके सिर पर हाथ रखकर सहलाया और बोला, 'ख्वाहिशें कभी अधूरी नहीं होती, बस जब तक उनके पूरे होने का वक्त नहीं आता तब तक वो पूरी नहीं होतीं।
तुम चाहो तो आज भी तुम्हारी वो अधूरी ख्वाहिश पूरी हो सकती है,,,
इस बार उसने मुझे सवालिया नजरों से देखा, जैसे उसको यह लग रहा हो कि कहीं मैं भी उसकी मजबूरी का फायदा तो नहीं उठाना चाहता, या फिर शायद कुछ और सवाल जो उसके मन-मस्तिष्क में आ रहे हों।
मैं उठकर भीतर गया, अलमारी से सुर्ख लाल जोड़ा और सोने के गहने निकाले, और ले जाकर उसके हाथों में रख दिए।
फिर मैं, अपनी कुर्सी पर बैठ गया, अब मैंने बोलना शुरू किया, ऐसी ही एक भयानक रात थी, जब मैं रूपा के साथ शिमला से अपना हनीमून मनाकर लौट रहा था,, हमारी शादी को अभी केवल 15 दिन बीते थे,, लौटकर मुझे अपनी ड्यूटी ज्वाईन करनी थी,, कार में हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे कुछ ऐसे बैठे थे जैसे कि अब कभी ये हाथ जुदा नहीं होंगे,, अचानक,, जोर के झटका लगा और हमारी कार, खाई में जा गिरी।
जब होश आया तो पता चला कि तीन दिन पहले भयानक एक्सीडेंट में मैंने रूपा को खो दिया था।
किसी तरह उस हादसे से खुद को उबारा आज इस बात को बीते आठ साल हो चुके हैं। मगर आज भी लगता है जैसे वो मेरे आसपास है।
इतना कहकर, राजीव अपनी कुर्सी से उठा और अब तक खाली हो चुके कॉफी के दोनों कप उठाकर किचन की ओर बढ़ गया।
इधर, रानी भी अपनी जगह से उठकर वॉशरूम की ओर चल दी।
थोड़ी देर बाद, जब वो बाहर आई, तो राजीव की नजरें उस पर से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं,,, उसे लग रहा था मानो, रूपा यहीं तो थी,, उसके पास,,, हमेशा,,, वो कहीं नहीं गयी थी,,, अचानक वो आगे बढ़ा और उसने उस लाल सुर्ख जोड़े में लिपटी, गहनों से सजी रानी को अपनी बांहों में भर लिया,,, बेतहाशा उसे चूमने लगा,,, उसकी आंखों से आंसू इस तरह बहने लगे जैसे मानो कबसे उसने उन पर रोक लगा रखी थी,,, इधर रानी भी बेसाख्ता रोए जा रही थी,,,
बाहर और भीतर दोनों ओर बारिश का जैसे सैलाब आ गया हो।
बाहर की बारिश धरती के गर्भ को सींच रही थी, और भीतर की बारिश जैसे अधूरी ख़्वाहिशों को,,,
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ख्वाहिशें हमेशा पूरी होती हैं, बस उम्मीद का दामन कभी मत छोड़िए।
Be positive, live positive
उम्मीद है, आपको कहानी पसंद आई होगी।
जल्दी ही फिर हाजिर होऊंगी, एक नई कहानी के साथ।
Till then bye 🙏